कुछ लेखक ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़कर हम उनके बारे में जानने लगते हैं।
और कुछ लेखक ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़ते-पढ़ते हम अपने बारे में जानने लगते हैं।
महादेवी वर्मा मेरे लिए दूसरी श्रेणी की लेखिका हैं।
जब मैंने उन्हें पहली बार पढ़ा था, तब मैं केवल उनकी कविताएँ पढ़ रही थी। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, जीवन बदला, जिम्मेदारियाँ बढ़ीं और स्वयं को समझने की कोशिश शुरू हुई, वैसे-वैसे मुझे लगा कि मैं महादेवी वर्मा को नहीं पढ़ रही हूँ...
मैं उन स्त्रियों को पढ़ रही हूँ जो अपने समय से आगे थीं, लेकिन अपने समय द्वारा पूरी तरह समझी नहीं गईं।
हिंदी साहित्य उन्हें "आधुनिक मीरा" कहता है।
यह उपाधि बिल्कुल गलत भी नहीं है।
उनकी कविताओं में विरह है, प्रतीक्षा है, समर्पण है और एक ऐसी तड़प है जो मीरा की याद दिलाती है। लेकिन जितना मैं उन्हें पढ़ती हूँ, उतना लगता है कि उन्हें केवल मीरा कह देना शायद उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना है।
क्योंकि मीरा का कृष्ण स्पष्ट था।
महादेवी का नहीं।
मीरा जानती थीं कि उन्हें किसे पुकारना है।
महादेवी की कविताएँ पढ़कर लगता है कि वह किसी व्यक्ति को नहीं, किसी अनुभूति को खोज रही हैं।
शायद प्रेम।
शायद शांति।
शायद स्वयं को।
या शायद उन सबको एक साथ।
उनकी प्रसिद्ध पंक्ति है-
जो तुम आ जाते एक बार
कितनी करुणा कितने सँदेश,
पथ में बिछ जाते बन पराग,
गाता प्राणों का तार-तार
अनुराग-भरा उन्माद-राग;
आँसू लेते वे पद पखार !
जो तुम आ जाते एक बार !
पहली नज़र में यह किसी प्रिय की प्रतीक्षा लगती है।लेकिन हर बार जब मैं इसे पढ़ती हूँ, इसका अर्थ बदल जाता है।
कभी लगता है वह प्रेम को पुकार रही हैं।
कभी लगता है वह ईश्वर को।
और कभी लगता है कि वह अपने उस स्वरूप को पुकार रही हैं, जिसे जीवन की भागदौड़ में कहीं पीछे छोड़ आई हैं।
शायद यही महान साहित्य की पहचान है।
वह हर उम्र में नया अर्थ दे देता है।
महादेवी वर्मा की कविताओं में जो विरह दिखाई देता है, मुझे वह केवल किसी व्यक्ति से बिछड़ने का विरह नहीं लगता।
वह उस जीवन का विरह भी हो सकता है जिसे हम जीना चाहते थे।
उस पहचान का विरह जिसे हम कहीं खो बैठे।
उस स्वतंत्रता का विरह जिसकी कल्पना तो की, लेकिन जिसे पूरी तरह जी नहीं पाए।
इसीलिए जब मैं उनकी प्रसिद्ध पंक्ति पढ़ती हूँ -
"मैं नीर भरी दुख की बदली..."
तो मुझे उसमें केवल दुःख नहीं दिखाई देता।
मुझे उसमें एक ऐसी स्त्री दिखाई देती है जो अपने भीतर के भावों से भागती नहीं।
जो अपने दुःख को स्वीकार करती है।
जो संवेदनशील होने से शर्माती नहीं।
आज के समय में, जहाँ हर कोई मजबूत दिखना चाहता है, महादेवी हमें याद दिलाती हैं कि अपनी संवेदनाओं को स्वीकार करना भी एक शक्ति है।
शायद इसी कारण उनकी कविताएँ आज भी पुरानी नहीं लगतीं।
वे आईने जैसी लगती हैं।
हर पाठक उनमें अपना चेहरा देख लेता है।
लेकिन महादेवी वर्मा केवल कविताओं तक सीमित नहीं थीं।
उन्होंने ऐसे समय में शिक्षा, स्त्री-अधिकार और आत्मनिर्भरता की बात की, जब यह सब कहना आसान नहीं था।
उन्होंने जीवन को अपने तरीके से जिया।
और शायद इसी वजह से समाज उन्हें किसी एक परिभाषा में बाँध नहीं पाया।
कभी उन्हें कवयित्री कहा गया।
कभी शिक्षिका।
कभी आधुनिक मीरा।
लेकिन मुझे लगता है कि महादेवी वर्मा इन सबके बीच कहीं थीं।
वह एक ऐसी स्त्री थीं जो अपने समय से संवाद कर रही थीं, और साथ ही आने वाली पीढ़ियों से भी।
शायद यही कारण है कि आज, इतने वर्षों बाद भी, उनकी कविताएँ पढ़ते समय ऐसा नहीं लगता कि हम इतिहास पढ़ रहे हैं।
ऐसा लगता है जैसे कोई स्त्री हमारे सामने बैठी है और धीरे से पूछ रही है-
"क्या तुम भी कभी अपने भीतर कुछ खोजती हो?"
और शायद इसी प्रश्न में महादेवी वर्मा की सबसे बड़ी प्रासंगिकता छिपी है।
तो क्या महादेवी वर्मा आधुनिक युग की मीरा थीं?
हाँ, शायद थीं।
लेकिन उससे पहले वह एक ऐसी स्त्री थीं जिसने दुनिया को यह सिखाया कि अपनी आत्मा की आवाज़ सुनना भी एक साहस है।
और शायद इसी कारण उन्हें पढ़ना कभी समाप्त नहीं होता।
हर उम्र में वे नई लगती हैं।
हर बार वे कुछ नया कह जाती हैं।
और हर बार ऐसा लगता है कि हम उन्हें नहीं, स्वयं को पढ़ रहे हैं !!
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